कैसे लें चने की बेहतर पैदावार

चने की फसल पर चना को दालो का राजा भी कहा जाता है। यह देश का मुख्य दलहनी फसल है। दलहनी फसलों के अंतर्गत आने वालेक्षेत्रफल का लगभग 27 प्रतिशत हिस्सा चने की खेती का है एवं उत्पादन में लगभग 33 प्रतिशत चने का योगदान होता है। चने की फसल शाकाहरी लोगों के लिए प्रोटीन का उत्तम स्त्रोत है। चना कई पोषक तत्वों का स्त्रोत माना जाता है। इसमें प्रोटीन 11, कार्बोहाइड्रेट 61.5 एवं वसा 4.5 प्रतिशत तक पाया जाता है। इसकी हरी पत्तियों से साग तथा सूखा दाना सब्जी, दाल बनाने में प्रयुक्त होती है। चना दलहनी फसल होने के कारण यह जड़ों में वायुमंडलीय नत्रजन स्थिर करती है, जिससे खेत की उर्वराशक्ति बढ़ती है। सबसे अधिक चने का क्षेत्रफल एवं उत्पादन वाला राज्य मध्य प्रदेश है।


चने का वर्गीकरण : चने की खेती कई गुणों से भरपूर है एवं इसे चिकपी और बेंगल ग्राम के नाम से भी जानते हैं। चने को दो जातियों में वर्गीकृत किया गया हैंसाइसर एरिटिनम : देशी चना के नाम से जाना जाता है- साइसर काबलियम : इसे काबुली चना के नाम से जाना जाता है। महत्व : पोषण की दष्टि से दलहनों को गरीबों का मांस कहा जाता है, क्योंकि इनमें धान्य की तुलना में लगभग 21.1 प्रतिशत प्रोटीन, 4.5 प्रतिशत वसा, 61.35 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट पायी जाती है। इसके साथ-साथ दलहनों में पायी जाने वाली प्रोटीन के अमीनो अम्ल के संगठन में यह विशेषता होती है कि यदि दलहन को धान्य के साथ मिलाकर भोजन में लिया जाय तो भोजन का जैविक महत्व बढ़ जाता है। चना को दालों का राजा भी कहा जाता है। इसका आटा चपाती, बेसन, नमकीन, मिठाइयां तथा अन्य खाद्य पदार्थों में प्रयोग होता है। इसके पौधे की हरी पत्तियां मैलिक अम्ल, ऑक्जेलिक अम्ल आदि के कारण नमकीन लगती हैं अतः चने के पौधों का सुखा चारा पशुओं को स्वादिष्ट लगता है।


जलवाय व तापमान : चना एक ऐसी फसल है जो ठन्डे व शुष्क मौसम की फसल में आती हैइसके अलावा चने के अंकरण की अगर बात की जाये तो इसके लिए उच्च तापमान की जरूरत भी होती है। चने के पौधे के बेहतर विकास के लिए अत्यधिक कम व मध्यम वर्षा वाले अथवा 65 से 95 सेंटीमीटर वर्षा वाले क्षेत्र उपयुक्त हैं। भूमि की तैयारी : -चने की खेती दोमट भूमि से मटियार भमि में सफलतापूर्वक की जा सकती है। चने की खेती हल्की से भारी भमि में भी की जाती है, किन्तु अधिक जलधारण एवं उचित जल निकास वाली भूमि सर्वोत्तम रहती है। मृदा का पी.एच. मान 6-7.5 उपयुक्त रहता है। खेत की तैयारी के लिए खरीफ फसल की कटाई के पश्चात एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करने के बाद 2-3 जुताइयां देशी हल अथवा कल्टीवेटर से करने के बाद खेत में पाटा चलाकर भूमि को ढेले रहित बनाकर समतल बना लेना चाहिए।


बीज दर : देशी चने की किस्मों के लिए बीज दर 70-80 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर एवं काबुली चने के लिए 100-125 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर होती है। बुवाई का समय : चने की बुवाई का समय अक् प्रथम सप्ताह से तीसरे सप्ताह तक है। बवाई की विधि : चना को खेत में छिटककर या हल के पीछे कंडों में बोया जाता है और ऊपर पटेला लगा दिया जाता है। हल से बोने पर पंक्ति से पंक्ति की दरी 25-30 सेमी तथा पौधे से पौधे की दूरी 15-18 सेमी रखी जाती है। बीज को 5 से 8 सेंटीमीटर की गहराई पर बोयें, किसान अगर चाहे तो बडे एरिया के लिए सीडडिल और देशी हल से बवाई कर सकते हैं।


खाद व उर्वरक अतः चने के पौधे में नाइटोजन को वायमंडल से अवशोषित करने की के लिए रायजोबियम नाम का बैक्टीरिया होता है। चने में फूल अंकरण के बाद जीवाणओं की ग्रंथियां बनने में 25-30 दिन पौधा लग जाते हैं। ऐसे में नत्रजन की 15 से 20 किलोग्राम व 40 से 50 फॉस्फोरस तथा 40 से 60 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर देना चाहिए। बाद उर्वरक : अच्छी पैदावार के लिए 20-25 टन सड़ी गोबर की खाद खेत की तैयारी के समय खेत में मिलाएं। उर्वरकों का प्रयोग मिट्टी परीक्षण के आधार पर करें। नत्रजन 20 किलोग्राम मिश्रित प्रति हेक्टेयर, फॉस्फोरस 50 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर, जिंक में, सल्फेट 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर। अक्टूबर सिंचाई : आमतौर पर चने की खेती असिंचित अवस्था में कतार की जाती है। चने की फसल के लिए कम पानी की आवश्यकता होती है। चने में पानी उपलब्धता के आधार पर पहली सिंचाई फल आने के पहले (बुवाई के लगभग 40 से 45 दिन बाद) तथा दूसरी भी सिंचाई फलियों में दाना भरते समय (बुवाई के लगभग 60 से 55 दिन बाद) करना चाहिए। यदि एक ही सिंचाई प उपलब्ध हो तो फूल आने के ACROSSX पहले दें। अधिक सिंचाई करने से पौधों की बढ़वार अधिक । 


फसल चक्र


खरीफ की फसलें मक्का, ज्वार, बाजरा व धान आदि से बाद में चने की फसल ली जाती है। ज्वार-चना ) धान-चना) बाजरा-चना।


मिश्रित खेती : चने को गेहं, जौ के साथ 1:1 के अनुपात में, अलसी व सरसों के साथ 4:1 में मिलाकर उगाना चाहिए। अक्टूबर में बोए गए गन्ने की दो कतारों के बीच चने की एक कतार उगाना काफी लाभप्रद है।